1. Question in UPSC Mains GSM3-2019
  2. Model Answer in Hindi

Question in UPSC Mains GSM3-2019

  • The public expenditure management is a challenge to the government of India in the context of budget-making during the post-liberalization period. Clarify it.
  • (उत्तर-उदारीकरण अवधि के दौरान, बजट निर्माण के संदर्भ में, लोक व्यय प्रबंधन भारत सरकार के समक्ष एक चुनौती है | इसको स्पष्ट कीजिए |) 15m, 250 words

Related questions in the past UPSC Exams

  • GSM3/2013: What are the reasons for the introduction of Fiscal Responsibility and Budget  Management (FRBM) act, 2003? Discuss critically its salient features and their effectiveness.

UPSC Mains Model Answer Writing Framework for public expenditure management for UPSC Mains GSM3

Introduction: Public Expenditure Mgmt

  • (Definition) Public expenditure management deals with allocation of Government’s economic resources into three channels 1) public administration 2) economic growth 3) welfare schemes.
  • In the aftermath of the LPG reforms in 1991,  the management of public expenditure is facing challenges on the following fronts: 

Body: Public Expenditure Mgmt why challenges post-LPG?

Sector Pre-LPG Post-LPG
  • Nationalisation of banks, 
  • International economy was not so greatly interconnected Basel norms less stringent.
  • Twin balance sheet syndrome,  government required to recapitalise the public sector banks because they cannot do it on their own  → Financial burden has increased
Monetary Policy and Fiscal Policy
  • High level of fiscal deficit.
  • RBI’s monetary policy which mandated high level of SLR to finance Government’s borrowing using bank depositors’ money.
  • Private sectors investment demand, consumerism has increased therefore RBI is forced to cut down the SLR to increase the loanable funds.
  • Since high level of fiscal  deficit was one of the reasons for BOP crisis, now Government has statutory FRBM requirements to control fiscal deficit.
  • RBI has statutory requirement to control inflation – So rampant borrowing from RBI is becoming difficult for government.
Private sector
  • Share of private sector in India’s economic growth and employment generation was limited due to the Licence Quota Inspector Raj.
  • Drastically increased.
  • Private sector requires ₹20 lakh crores every year for sustaining the current level of Economic Growth and Employment generation
  • Therefore, if the government does not control fiscal deficit  → crowding out of the private investment = challenges for India’s growth story.
  • Loss making public sector undertakings were supported by the Government as white elephant.
  • Difficult to sustain the Public Sector Undertakings against the heavy competition of private sector be it Air India or BSNL.
  • Government unable to pay salaries,  even no buyers for their privatization (=Strategic Disinvestment)
  • Population was sparse.
  • Most people didn’t have access to TV, fridge, mobile, internet or social media
  • Their demand for electricity was low.
  • Population has increased.
  • Aspiration of people have increased
  • They want clean water, 24/7 electricity, good quality of roads;
  • Lot of money required for infrastructure finance,
  • Railway alone requires 50 lakh crore between 2016-30, Government can’t spend more than 1.6 lakh crore a year.
  • Right to education, right to food, right to work (MGNREGA) were not yet ‘legal rights’.
  • Now they have become legal rights so the government is  required to to allocate large amount of funds for them. 
  • food subsidy costs ₹ >1.8 lakh crore, MGNREGA ₹ 60k crore
  • Post-LPG era, the level of education and demand for various amenities, and even per capita income has increased, but that has not been a corresponding increase in our tax to GDP (11%, where as countries with similar growth have >20%).
  • This puts further strain on Public Expenditure  Management
Public Administration
  • Small size of Government staff
  • Their salary levels were also low.
  • Public aspirations have increased,  number of welfare schemes increased,  Border Security challenges increased  →  employees   have increased
  • 6th pay commission and 7th pay commission  → salaries have also increased
  • Challenge? ‘Contracting out of the jobs’ to keep revenue deficit minimal. NPS where Employee himself is largely responsible for his pension etc.

Anyways, these are more than sufficient points, in real exam not possible to recollect all points so it’ll automatically compress down to 250 words. So let’s conclude:

Conclusion: yes Public Expenditure Mgmt = challenge Post-LPG

  • Thus, in the aftermath of LPG reforms,
  • Nation’s per capita income has increased,
  • Governments expenditure has increased,
  • Demands for infrastructure investment has increased.
  • But there has not been an adequate increase in the tax to GDP levels.
  • As a result, public expenditure management has become a challenge to the government.

Mistakes in Public Expenditure Answer Writing

  • If keyword such as Investment Growth, Bank Recapitalisation, Infrastructure Finance, Subsidy Burden are missing
  • Not quoting a single figure anywhere like MGNREGA ₹ 60k crore or food subsidy burden ₹ 1.8 lakh crore, or FD 3% etc.
  • Excessive focus on only a single part that welfare scheme burden has increased. You also need to talk about the Bank Recapitalisation, Public Sector Undertakings, Infrastructure Etc.
  • Type: Opinion based contemporary Q.
  • Span: >D-2 Years. (D-28 years to be precise from 1991’s LPG reforms
  • Difficulty Level: Medium. You need to be aware of all six pillars of economy. Past and present trends in GDP, deficit, subsidies.
  • Expected majority score: 5/> out of 15. Because candidate is required to address multiple dimensions. It is unlikely that PDF-zombies would have written some spectacular answer.

Model Answer in Hindi

Introduction: प्रस्तावना : सार्वजनिक व्यय प्रबंधन

  • (परिभाषा)- सार्वजनिक व्यय प्रबंधन,तीन स्तरों पर सरकार के आर्थिक संसाधनों के आवंटन से सम्बद्ध है 1) लोक प्रशासन 2) आर्थिक विकास 3) कल्याणकारी योजनाएं।
  • 1991 के एलपीजी (उदारवाद,निजीकरण एवं वैश्वीकरण) सुधारों के बाद, सार्वजनिक व्यय के प्रबंधन को निम्नलिखित मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

Body: सार्वजनिक व्यय प्रबंधन- क्यों यह चुनौती बन गया ?

क्षेत्र एलपीजी के पूर्व एलपीजी  के बाद
आर्थिक विकास बैंकों का राष्ट्रीयकरण, अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था इतनी अधिक सुसंबद्ध नहीं थी | बेसल मानदंड का पालन इतनी कड़ाई से नहीं होता था |
  • दोहरे तुलन पत्र की चुनौती
  • सरकार  की तरफ से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पुनर्पूंजीकृत करने की आवश्यकता है 
  • क्योंकि बैंक इसे स्वयं की  दम पर नहीं कर सकते हैं →सरकार का   वित्तीय बोझ बढ़ गया है|
मौद्रिक नीति एवं राजकोषीय नीति
  • भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति, जिसने SLR(वैधानिक तरलता अनुपात) के उच्च स्तर को बनाये रखा ताकि सरकारी घाटे के लिए वित्त पोषण हो सके |
  • निजी क्षेत्रों में निवेश की मांग, उपभोक्तावाद में वृद्धि हुई है अत: आरबीआई को ऋण योग्य निधियों को बढ़ाने के लिए एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात)  में कटौती करने के लिए मजबूर है।
  • राजकोषीय घाटे का उच्च स्तर भुगतान संतुलनके संकट का एक कारण था |  अब सरकार के ऊपर राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन कानून हैं।
  • भारतीय रिजर्व बैंक के पास मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक दायित्व है – इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक  से बड़ा कर्ज लेना सरकार के लिए मुश्किल हो रहा है।
निजी क्षेत्र
  • लाइसेंस कोटा इंस्पेक्टर राज के कारण  भारत की आर्थिक वृद्धि एवं रोजगार सृजन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सीमित थी |
  • तीव्रतम वृद्धि ।
  • आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के वर्तमान स्तर को बनाए रखने के लिए निजी क्षेत्र को प्रत्येक वर्ष 20 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होती है |
  • इसलिए यदि सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित नहीं करती है तो निजी निवेश के निर्गमन से सतत विकास की गाथा में आने वाली चुनौतियां |
सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों का आर्थिक विकास  अलाभप्रद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम केवल सफ़ेद हाथी बनकर रह गए है|
  • निजी क्षेत्र द्वारा दी जा रही कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच  सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के स्थायित्व को बनाए रखने में कठिनाई होना – चाहे हो एयर इंडिया या बीएसएनएल।
  • सरकार वेतन का भुगतान करने में असमर्थ,
  • यहां तक ​​कि ऐसे उपक्रमों के निजीकरण (=रणनीतिक विनिवेश) के लिए कोई खरीददार नहीं मिल रहे है |
बुनियादी सुविधाए जनसंख्या व् लोगो की अपेक्षाए  कम थी.
  • जनसंख्या में वृद्धि हुई है| लोगों की अपेक्षाओं ने स्वच्छ पानी, 24X7 बिजली एवं  गुणवत्तापूर्ण सड़कों की मांग को बढ़ाया है | विनिर्माण और निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है  → बुनियादी ढांचे के वित्त के लिए विपुल  धन की आवश्यकता |
  •  रेलवे को अकेले 2016-30 के बीच 50 लाख करोड़ की आवश्यकता है किन्तु सरकार प्रति वर्ष 1.6 लाख करोड़ से अधिक खर्च नहीं कर सकती |
कल्याण शिक्षा का अधिकार, अन्न  का अधिकार, रोजगार  का अधिकार (MGNREGA) अभी तक कानूनी अधिकार नहीं थे।
  • अब वे कानूनी अधिकार बन गए हैं, इसलिए सरकार को उनके लिए बड़ी राशि आवंटित करने की आवश्यकता है।
  • खाद्य सब्सिडी की लागत ₹ > 1.8 लाख करोड़,
  • MGNREGA ₹ 60 हजार  करोड़
  • विभिन्न सुविधाओं की मांग , शिक्षा का स्तर एवं  यहां तक ​​कि प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि हुई है, लेकिन हमारे कर : जीडीपी अनुपात में यह तरह की वृद्धि नहीं हुई है (11%, जहां समान विकासदर वाले  देशों में > 20 है %) इसलिए सरकार के पास जन अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है.
लोक प्रशासन
  • सरकारी कर्मचारियों की संख्या कम थी |
  • सरकारी वेतन का स्तर भी कम था |
  • जनता की अपेक्षाएं  बढ़ी हैं, कल्याणकारी योजनाओं की संख्या बढ़ी है, सीमा सुरक्षा की चुनौतियाँ बढ़ीं → कर्मचारी  बढ़े हैं |
  •  6 वें एवं 7 वें वेतन आयोग ने वेतन सरकारी कर्मचारियोंका स्तर भी बढ़ा दिया है |
  • चुनौतीयां  – राजस्व घाटे को कम रखने के लिए अनुबंधित नौकरी करना । एनपीएस  (नवीन पेंशन योजना ) जहां कर्मचारी स्वयं अपनी पेंशन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है |

Conclusion (निष्कर्ष) उपसंहार – सार्वजनिक व्यय प्रबंधन

  • इस प्रकार, एलपीजी (उदारवाद,निजीकरण एवं वैश्वीकरण) सुधारों के बाद,
  • देश की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है,
  • सरकारी व्यय बढ़ा है,
  • बुनियादी ढांचे में निवेश की मांग बढ़ी है |
  • लेकिन कर : सकल घरेलू उत्पाद  के अनुपात के स्तर पर पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई है।
  • परिणामस्वरूप, सार्वजनिक व्यय प्रबंधन, सरकार के लिए एक चुनौती बन गया है।

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